अपने चतुर्दिक परिवेश और अपने भीतर के संसार के मध्य व्यक्ति जब संवाद के धरातल पर कदमताल करता है, तो संवेदनाओं का एक पुञ्ज अपनी ऊर्जा से व्यक्ति को सराबोर कर देता है। यही ऊर्जा उसे मैं से हम की यात्रा का पथिक बनाकर सृजनात्मक सन्दर्भों से जोड़ती चली जाती है।
किशन 'प्रणय' की यह कृति इन्हीं सन्दर्भों की व्यापक संवेदना का विस्तृत फ़लक है।
प्रथम रचना 'बहुत हुआ अवकाश मेरे मन !' और अन्तिम रचना 'ख़्याल' तक रचनाकार अपने मन के भीतर के प्रश्नाकूल मौन को मुखरित करता हुआ संवाद स्थापित करता है और जीवन के विविध प्रसंगों और सन्दर्भों को उभारता हुआ अपने वैचारिक दृष्टिकोण से अनुभूति के आयाम विकसित करता है।
जब व्यक्ति मन से संवाद करता है तो ही कह पाता है:
"बहुत हुआ अवकाश, मेरे मन ! अब तो पथ को नहारूँ, जीवन व्यर्थ बिताने से तो, अच्छा है जीवन हारूँ।"
भौतिक जगत में आध्यात्मिक संचेतना का संचरण करते हुए कवि ने एक वैचारिक संधान किया है। इसी भाव भूमि की 'अन्तःस्वर से मिल जाने दो', 'मेरा मन जो कहता सच है', 'मन तू क्षणिक सुखों के पीछे, क्यों विचलित-सा हो जाता है', 'पक्ष तेरा भी रख मन! तेरी भी सुन लेता हूँ मैं' आदि रचनाएँ हैं, जो कवि के भीतर और बाह्य जगत के कई सन्दर्भों को विवेचित कर एक मार्ग प्रशस्त करती हैं।
कवि ने अपने अनुभवों को शब्दायित करते हुए सामाजिक सरोकारों से सन्दर्भित रचनाओं को उकेरा है, जो समाज और उसके परिवेश की गहन पड़ताल करती हैं।
'कठपुतली', 'रंगों में उलझन है', 'मैंने जीवन देखा है', 'असली बुढ़ापा', 'हँसता अंधियारा', 'मजदूर', 'भाँती-भाँती का जीवन देखा', 'एक दुनिया ऐसी भी', 'मैं, टिंकू और लोकतंत्र', 'सारा किस्सा रोटी का', 'ख़्वाब में रोटी', 'मैं एक रास्ता हूँ', 'मुखौटे', 'डर', 'क्रोध' आदि ऐसी ही रचनाएँ हैं जिनमें सामाजिक यथार्थ को उकेरा गया है।
संग्रह की अन्य रचनाएँ जहाँ जीवन-मूल्य और संचेतना के प्रति सजग करती हैं, वहीं हर परिस्थिति में सकारात्मक रहने की पहल करती हैं। जहाँ स्व से संवाद है, वहाँ स्नेह की धारा का अजस्स्रोत है, और जहाँ स्नेह के अंकुर प्रस्फुटित हैं, वहाँ सकारात्मकता का पल्लवन।
प्रेम की इसी आभा में सृजन के आयाम दिग्दर्शित होते हैं। इसीलिए कवि ने प्रेम की उदात्तता को विस्तार दिया है:
"एक सफ़े पर प्रेम लिखा और पूरा खाली छोड़ दिया,
मैंने इतने खालीपन को, कितना अच्छा मोड़ दिया।
हो सकता था मैं उस पर पूरी दुनिया लिख देता पर,
मैंने पूरी दुनिया को एक लफ्ज़ से पीछे छोड़ दिया।"
प्रेम की यही धारा कवि के अन्तस की वह धारा है, जो उसे सृजन हेतु प्रेरित करती है, चतुर्दिक परिवेश का आकलन करने हेतु सावचेत रखती है, प्रकृति के सान्निध्य में रहने को उत्साहित करती है, भौतिक जगत से आध्यात्मिक पथ की यात्रा का दिग्दर्शन करती है और सामाजिक सन्दर्भों को परखने का अवसर प्रदान करती है।
अन्ततः यही कि किशन 'प्रणय' की ये तमाम रचनाएँ अपने समय की पड़ताल करते हुए उसे समझने और आत्मसात् करने की जिज्ञासा को बलवती करती हैं और समाज के समक्ष निरन्तर परिवर्तन के साथ उपजे विकास के प्रतिमानों को परखने का संकेत करती हैं।
कदाचित् इसीलिए कवि कहता है:
"बाल्यकाल से देखे और अनुभव किये तथ्यों के कारण मन में उठी संवेदनाओं को काव्य रूप देने का प्रयास किया है।"
अनुभूत संवेदनाओं को शब्दबद्ध करने की यही सृजनात्मकता कवि की शक्ति है, जो उसे अनवरत् रचनाशील बनाये रखती है।