हर नदी की कहानी - पुस्तक चम्बल (स्मृतियों की छाया में)

2025-12-25 5 views

हर नदी की कहानी - पुस्तक चम्बल (स्मृतियों की छाया में)

कवि प्रणय किशन ने मुझे एक आत्मीय पत्र के साथ  'चम्बल' नामक ये कविताएं पढ़ने के लिए भेजीं। इन कविताओं को अतीत और वर्तमान के भावात्मक विन्यास में चम्बल नदी की धड़कनों को सुनते हुए अपने अहसास के धागों में पिरोया गया है। बीहड़ों में बसे भय और निर्वासन के बीच बहती और अब स्मृति में किसी बारीक रेखा-सी ठहरी चम्बल के किनारों पर समय एक लिपिहीन इतिहास बनकर ठहरा हुआ-सा लगता है। इन कविताओं में मौन दृश्यों की अनेक अनुगूॅंजें सुनायी पड़ती हैं।

कवि प्रणय किशन की इन कविताओं में चम्बल इतिहास के गले में किसी चुप्पी-सी अटकी हुई है। एक मौन लम्बी आह-सी जिसे शब्दों की तलाश है। चम्बल के किनारे दुल्हनें रक्त में रॅंगी राजनीतिक घटनाओं-सी और मातायें-बेटियाॅं इतिहास के टूटे-बिखरे दस्तावेज़-सी लगती हैं। राज्यकर्त्ता अपने लिये खोज रहे हैं दौड़ की वह दिशा जिसमें जन भूल जायें कि वे कबसे भाग रहे हैं। नदी कहीं नहीं जा रही वह तो धकेली जा रही है। ये कविताएं उस हर नदी की भी कहानी कहती हैं जो पीने योग्य नहीं रही।

कवि प्रणय किशन की कविताओं में ऐसा भावयोग प्रतीत होता है जैसे कोई शब्द रहित सत्य किसी दीप-सा झिलमिला रहा हो। जैसे धूप में कोई वृक्ष किसी छाॅंव की इच्छा से रोपा जा रहा हो। सभ्यता की अंतिम साॅंसों में उच्चरित होती ध्वनियों -सी ये कविताएं किसी थकी हुई हवा के बीच जीवन के उन संकेतों जैसी भी हैं जो भले ही आंखों से ओझल होते जा रहे हों पर नदी में बचे हुए जल की स्मृति की सतह पर उनके मौन बिम्ब अब भी झिलमिला रहे हैं। यह मौन झिलमिलाहट ही इन कविताओं को प्रकाशित कर रही है।

कवि प्रणय किशन कहते हैं ----- मैं यह कविता तभी लिख पाऊॅंगा जब मेरे भीतर मौन बहे......