उमंग, उल्लास से सराबोर — जवानी का जोश, मगर बड़े रचनाकार और कवि किशन प्रणय का जन्म कोटा में हुआ।
पेशे से एक जिम्मेदार अध्यापक, यूं तो कहानी, उपन्यास, बाल साहित्य का सृजन भी खूब जिम्मेदारी से किया है, लेकिन कविता इनके तन-मन में निवास करती है। यों कह सकते हैं कि कविता को ये जीते हैं।
हिंदी-राजस्थानी भाषा में समान रूप से लिखने वाले कवि प्रणय ठेठ गांव के व्यक्ति हैं और सोच में एक प्रबुद्ध, आधुनिक चिंतक। इनका रहन-सहन, व्यवहार गांव की धरती से जुड़ा है। बोलने में मृदुभाषी और अपने बारे में बहुत कम बोलते हैं। ठीक ऐसा ही इनकी रची कविताओं के लिए कहा जा सकता है — कविताओं में भी छोटी-छोटी पंक्तियों की छोटी सी कविता में बहुत बड़ी बात कह जाते हैं।
संपूर्ण सृष्टि का निर्माण पांच तत्वों - पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु से हुआ है। इन पांच तत्वों के बारे में विचार करते हुए कवि प्रणय ने 'पंचभूत' कविता संग्रह का प्रणयन किया है। इसमें:
पृथ्वी पर - 23 कविताएं
पानी पर - 15 कविताएं
अग्नि पर - 14 कविताएं
आकाश पर - 14 कविताएं
वायु पर - 15 कविताएं
इस प्रकार कुल 81 कविताओं का सुंदर संग्रह बन पड़ा है। ये केवल कविताएं ही क्या, यों समझिए कि सूत्र रूप में कविताएं हैं, जिनमें इन पांचों तत्वों के एक-एक पहलू, एक-एक बिंदु पर अत्यंत गहनता से अध्ययन करने के पश्चात उनके आध्यात्मिक पक्ष को गरिमामय ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
इनमें कुछ कविताएं चार-चार पंक्तियों की हैं, मगर अपने आप में पूर्ण हैं और एक शब्दचित्र, कवि की अनुभूति का दृश्य उजागर करती हैं। इनमें:
गांव का ठेठ निरालापन
प्राकृतिक सौंदर्य
आध्यात्मिक ऊँचाई के बिंब
प्रतीकों के माध्यम से इस संसार की असारता
जीवन की क्षणभंगुरता
पल-पल रंग बदलती प्रकृति का वैभव
सभी कुछ अभिव्यक्त हुआ है।
कविताओं के लघु आकार के अनुसार, इस पुस्तक की भूमिका कोटा के जाने-माने कहानीकार, उपन्यासकार श्री विजय जोशी ने 'लोक संवेदना के उजास' के रूप में, सारसंक्षेप में सुंदर ढंग से लिखा है।
इन कविताओं में पांचों तत्वों की सूक्ष्मता, विशालता, गहनता और इस सृष्टि पर पड़ने वाले उनके प्रभाव को कवि ने अपने अध्ययन और अनुभूतियों से आत्मसात कर, कविताओं के रूप में प्रकट किया है।
जब ये मंच पर इन कविताओं को प्रस्तुत करते हैं तो —
भाषा का सौंदर्य
राजस्थानी भाषा की मिठास
शब्दों के गरिमामय अर्थ
और कवि की प्रभावशाली वाणी के ओजस्वी स्वर
स्रोताओं के हृदय पर घनीभूत होकर छा जाते हैं।