हाड़ोती अंचळ का युवा लिखारा भाई किशन प्रणय की कथेतर गद्य की पोथी 'सोहणी रात अर धूजता हाथ' पाछला दो दनाँ मै पढ पढा'र पूरी करी। पोथी नै पढताँ होयां रात ई कांई अमूझो भर्यो दन बी सोहणो लागबा लागग्यो।
चंदरमा की तो सोळा कला र्है छै पण ई 'सोहणी रात...' का चंदरमा की पूरी अट्ठारा कला छै।
नौ रस अर नौ रंग को दुगुणो छै अट्ठारा। अजी, पूरा अट्ठारा पाठ छै ई मै। कविता सूं साहित्यै की जातरा की सुरुआत करबा हाळा भाई किशन नै संदा शीर्षक अस्या मांड्या छै कै तुकां को मेल पढ'र एक मन तो हांसी आ जावै छै।
उस्यां पोथी को शीर्षक 'सोहणी रात अर धूजता हाथ' की ठाम पै 'अबखो गेलो, चाल अकेलो' होतो तो किशन जी की साहित्यै जातरा पै एकदम फिट बैठतो।
किशन जी, जी गेला पै चाल पड़या छै ऊ घणो अबखो छै। कविता, उपन्यास अर अब कथेतर गद्य की पोथी अर पोथ्या बी फोरी-पातळी अर कामचलाऊ न्है होर, घणी ऊँडी ऊँडी बातां अर करडा सूं करडा विषयां पै मांडबो अबखो कारज छै कै कोइनै?
राजस्थानी भाषा, साहित्यै एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर रै आर्थिक सहयोग सूं प्रकाशित किशन जी की या पोथी हर कोण सूं अनोखी लागै छै।
हर पाठ की सुरुआत एक विचार सूं होवै छै अर फेर ऊ विचार ई विस्तार देबा लेखै आँख्यां सामै घटित कोई घटना को बखाण छै। अर दोनी की बुणघट असी सुहावणी अर सांतरी छै कै पाठक पूरी पढयाँ बना जक न्है लै सकै।
दो च्यार आलेखां नै छोड द्यां तो हर पाठ मै घुमक्कड किशन की कसी न्है कसी जातरा को ई बखाण छै। अतना बरतान्त पढता थकां पाठक पोथी नै जातरा बरतान्त की पोथी बी मान सकै छै। कोई-कोई ठाम तो संस्मरण बी लागै छै।
पहलो पाठ 'मिनख जाता आँख्यां काढ़ अर मूंडो मोडयां ऊभा पहाड़' एक अणूठो ई बरतान्त छै।
जीमै किशन जी पहाड़ां पै स्नो फॉल देखबा का लोभी मनख्या को जिकर करै छै। मनख बी कतनो सुवारथी छै, परकरति नै खुद का फायदा काण बगाड़ र्यो छै। अर ई बगाड़ा को परिणाम देख'र परकरति नै ई दूषण दे रयो छै।
'चंबल को श्राप अर छोरी को बाप' ई आलेख में बच्यारी चंबल मै बरायां गा दी, जबकि कसूर तो मनख का अपणा सुभाव को छै।
चंबल की करायां को फायदो उठाता थकां डाकू यां घुस्या र्है छा तो ईमै चंबल को कांई दोस?
'बांदरा की डकैती अर भाईला की बकैती' मै बच्यारा अणबोला जनावर बांदरा बी डकैत बना द्या यां मनख्यां नै।
दुकानदार बिक्री बट्टा काण अतना चालाक हो गया कै बांदरा के फ्रूटी पीबा को रफत पटक द्यो अर मनमानी कीमत पै फ्रूटी देबा लाग्या।
बच्यारा सैलाणी बी कांई करै? बांदरा सूं चीजां पाछी लेणी छै तो फ्रूटी मोल लेणी ई पड़ैगी। अब ई पूरा बरतान्त मै बच्यारा बांदरां को कांई दोस?
धरम की आड़ मै अवैध काम अर धरम का नाम पै मनख्या मै फूट डालबा सूं जुड्या दो बरतान्त बी घणा रुपाळा छै पोथी मै।
कविता मांडबा की जोरा जोरी अर फेर कविता नै सुणाबा की स्टोरी गजब मांडी छै किशन जी नै।
'ठाकुरां का चाळा अर पंद्रा सौ बीघा वाळा' मै किशन जी नै अपणां भायला की झूठी शान को नसो उतरतो बी दखायो छै।
'स्कीमां की लेण अर झापटां खाती बहैण' मै छोरा-छोरी मै आंतरो राखतो ई पुरुष प्रधान समाज को असली मूंडो बी दखायो छै।
'तनखा नब्बे हजार अर शबद नं आर्या चार' आलेख सरकारी तंत्र मै अपणी अयोग्यता का मजा लूटता शिक्षकां की साँच बखाणतो है।
'कोरोणा की जोरा...' अर 'बना बात को केस...' दोनी मै पुलिस तंत्र की कमी अर जोरी को जिकर छै।
मुळकण बखेरतो आलेख 'डाइजो लुगाई को अर छोटा मूंडो भाई को' अस्या क्लाइमैक्स पै रुक्यो कै र्है-र्हैर हांसी चालती री।
एक दो आलेख कसावट मै काच्या र्है गया, एक आद मै बात की सुरुआत कस्या बच्यार सूं होई अर क्हाँ जा पूगी, वर्तनी की लारां ई वाक्य विन्यास की गड़बड़ी छै।
कोई कोई ठौरां वांको कवि मन भी उलाळा मारतो सो लाग्यो पण कांई बी हो पोथी को आनंद आग्यो। ई पोथी की लारां पाठक नै कतनी ई घटनावां देखी तो कतनी ई जातरा पूरी करी। कतना ई देवरा ढोक्या तो कतना ई गेला नाप्या। कतनी ई नंद्या तरी तो कतना ई डूंगर डांक्या। कतना ई दन भाग्या तो कतनी ई रातां जाग्या।
पोथी का पहला सबद सूं लारां चालता-चालता किशन की लारां पोथी की आखरी पंगत मै "घरां पूघग्या"।
साहित्यै की न्याळी-न्याळी विधावां मै सिरजण करतां किशन कैई गेलां पै चाल खड्यो छै। ई गैला पै बळबळती दप्हैरयां आवैगी तो सोहणी रातां बी आवैगी।
बस अब तो यो देखणो छै के कलम कोराणी नै थाम्यां ऊका हाथ धूजबा न्है लाग ज्या। पोथी लेखै किशन नै बधायां अर नुया सिरजण काणै मंगळकामनावां।