‘प्रणय की प्रेयसी’ कृति की भाषा धर्मवीर भारती की कनुप्रिया की याद दिलाती है

2024-02-20 • Kota, Rajasthan

‘प्रणय की प्रेयसी’ कृति की भाषा धर्मवीर भारती की कनुप्रिया की याद दिलाती है

ग्रासरूट मीडिया के सहयोग से कोटा यूनिवर्सिटी के कुलपति सचिवालय सेमिनार हॉल में 3 सितंबर को किशन प्रणय की हिन्दी की पुस्तक प्रणय की प्रेयसी का लोकार्पण और पुस्तक चर्चा का आयोजन हुआ जिसमें माननीय अतिथि प्रख्यात कवि आलोचक कृष्ण कल्पित, ग्रासरूट मीडिया और आखर राजस्थान के संयोजक प्रमोद शर्मा और वरिष्ठ आलोचक कुंदन माली सम्मिलित रहें। कार्यक्रम के संयोजक विश्वविद्यालय के खेल निदेशक डॉ विजय सिंह थे और कार्यक्रम का संयोजन वरिष्ठ समीक्षक विजय जोशी द्वारा किया गया।

कृष्ण कल्पित ने पुस्तक पर चर्चा करते हुए कहा”इस कविता संकलन का शीर्षक भी मानीखेज है - प्रणय की प्रेयसी ! और कवि का नाम किशन प्रणय है । कवि अपने उपनाम प्रणय का काव्यात्मक के साथ आत्मकथात्मक इस्तेमाल भी करते हैं । ऐसा करने से भाषा और अभिव्यक्ति का सौंदर्य बढ़ जाता है । इस संकलन की भाषा धर्मवीर भारती की कनुप्रिया की याद दिलाती है । किशन प्रणय युवा कवि हैं जो अपनी भाषा की तलाश बहुत शिद्दत से करते हैं ।” वरिष्ठ साहित्यकार कुंदन माली ने कहा “हमारे जीवन में प्रेम का महत्व एक अनिवार्य तत्व के तौर पा तो है ही, लेकिन मौजूदा कालखंड में तकनीक के घटाढोंप में युवा पीढ़ी णे प्रेम की सात्विक भावना और उसकी व्यंजना को शारीरिक आवश्यकता से जोड़ लिया है, जो कि किसी भी दृष्टिकोण से न तो स्वीकार्य है और ना ही सामाजिक मान्यता के अनुकूल। ऐसे जटिल तथा अर्थविषयर्यता के माहौल मे कवि किशन प्रणय णे अपने स्तर पर प्रेम के स्वाभाविक स्वरूप; उसकी नैसर्गिक सहजता-सरलता तथा भाव-भावना की तरलता को रेखांकित करने का उपक्रम किया है।” ग्रासरूट मीडिया के प्रमोद शर्मा जी ने कहा “जीवन मूल्यों को उभरती यह कृति वर्तमान संदर्भों में उल्लेखनीय कृति है।”

संचालन करते हुए वरिष्ठ समीक्षक विजय जोशी जी ने कहा “कविता में कथा का दिग्दर्शन कराती यह कृति 'प्रणय' और 'प्रेयसी' के भावों को गहराई से उभार कर प्रश्नानुकूलता की ओर यात्रा ही नहीं कराती वरन् संवाद करते हुए स्व से जोड़े रखती है और इस 'जीवन' में 'कवि का जीवन' खोजती हुई 'कुछ पा लेने की इच्छा' के साथ अन्ततः'प्रणय का मिलाप' दिखाते हुए 'प्रेयसी का समर्पण' दर्शाती है तथा 'प्रेयसी का अन्तिम संवाद' सुनाते हुए 'प्रणय का पश्चाताप' अनुभूत कराती है।

अनुभूति की इसी पराकाष्ठा में मनुष्य के मनोविज्ञान का चित्रण करती ये कविताएँ अपने दार्शनिक भावों के सान्निध्य में 'प्रणय का प्रण' भी ध्वन्यांकित करती है तो उसे श्रवण करने की एकाग्रता तक भी ले जाती है।” संयोजक विजय सिंह जी ने धन्यवाद देते हुए कहा “युवा कवि किशन प्रणय की कविताएँ समाज का दर्पण हैं।” युवा कवि किशन प्रणय ने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बताते हुए पुस्तक से कविता पाठ किया। किशन प्रणय की अब तक हिन्दी, राजस्थानी और मालवी भाषाओं में मिलाकर कुल दस पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है।