अंतरभाव

2025-12-24 6 views

अंतरभाव

अप्रतिम कवि-चिंतक दिवंगत कमलेश जी के लिए

होने का स्पंदन

भटकता

निरंतर

न होने के अरण्य में।

क्या मृत्यु कोई मदिरा है

जिसे पिया जा सकता हो

मोटी भटियारिन की सराय पर

और मनाया जा सकता हो

न होने का उत्सव!

जीवितों में वह सामर्थ्य कहाँ

वे प्रतीक्षा कर सकें

हिसाब चुकता होने तक!

ओ अप्सराओं! अपने हाथ बढ़ाओ

विरम सकूँ कुछ देर

तुम्हारे डेरों पर।

हे देवताओं! मुझे स्वीकार करो

पा सकूँ कुछ देर

सान्निध्य तुम्हारा

अंतरभाव में लीन होने तक!