अप्रतिम कवि-चिंतक दिवंगत कमलेश जी के लिए
होने का स्पंदन
भटकता
निरंतर
न होने के अरण्य में।
क्या मृत्यु कोई मदिरा है
जिसे पिया जा सकता हो
मोटी भटियारिन की सराय पर
और मनाया जा सकता हो
न होने का उत्सव!
जीवितों में वह सामर्थ्य कहाँ
वे प्रतीक्षा कर सकें
हिसाब चुकता होने तक!
ओ अप्सराओं! अपने हाथ बढ़ाओ
विरम सकूँ कुछ देर
तुम्हारे डेरों पर।
हे देवताओं! मुझे स्वीकार करो
पा सकूँ कुछ देर
सान्निध्य तुम्हारा
अंतरभाव में लीन होने तक!