राकेस नै सोहन आड़ी थोड़ी देर देख’र सोहन सूं पूछी “तो सोनू ! म्हारा भाई ! काई छै थारा ई उपन्यास को नाम ?” सोहन नै प्रकासक आड़ी देख्यो अर ऊ कै बोलबा की बाट न्हाळबा लाग्यो। प्रकासक नै बी सोहन आड़ी एक टक देख’र क्ही जस्या ऊ का सामै अभिनव ई बैठ्यो हो “अबखाया का रींगटां।” सोहन की निजरां प्रकासक पै ई अटक गी। टेम जस्या थम ग्यो होवै। सोहन का मन मं ऊ का ई बिचार भड़ीका खार्या छा। ऊ हैराण छो कै प्रकासक ई उपन्यास नै कठी आड़ी लै जार्यो छै। राकेस दोन्या कै तांई छानो मूनो देख’र सोहन का हाथ पै हाथ मेलता हुया प्रकासक सूं बोल्यो “रसौ वै स: ! रसौ वै स: ! …….आदि ! …… वां रिंगटा मं बी तू जिंदगाणी को मजो हेरबो भूल ग्यो कै ? कैनवास पै खाँच्यां रिंगटा बी आपणा भीतर एक पूरो चितराम लेर चालै छै। हेरबा वाळी आँख्यां भाटा मं भगवान हेर लै छै। आदि ! पाणी की दिसा पाणी ई जाणै छै पण ऊ को विस्तार तो म्हानै बी दीखै छै। नाळा नद्यां मं मलबा कै पाछै नाळा नं रहै अर नद्यां समंदर मं मलबा पाछै नद्यां। पाणी ऊ ई छै पण नाम बदल जावै छै। जै चीज आज अबखायी दीखरी छै वा चीज वास्तव मं अबखायी छै कै कोनै या तो आपणी आपणी पैठ ई तोल पाड़ पावैगी ? म्हूं बी तो कागद पै रिंगटां ई खाँचूं छूं पण केई सिरजणकारी मन वां मं हेर लै छै आपणा आपणा चितराम। बात थारी बी सांची छै बण्यो तो सब रिंगटां सूं ई छै अब पाछै लोग अर लोगां को मन कै वै काई हेरै छै ई उपन्यास मं ?” सोहन राकेस जी आड़ी देख रह्यो छो। प्रकासक सांत छो। सोहन का हाथ मं खाली गिलास छो अर मन मं राकेस की क्ही बात। सोहन जाणै छो कै हाल प्रकासक बी ई उपन्यास मं पूरी पैठ नं रखाणै। हाल तो कहाणी घणी बाकी छी।