वात वणी वखत की है जदी आज को यो राजस्थान, राजस्थान कोनी थो ने कोई लोकतंत्र, सरकार ने संविधान नाम की चीज बी कोनी थी। न्हरा सारा राजा विया करता था ने वणा की न्हरी सारी रियासतां ने ठिकाणां विया करता था। हर जगाह की अपणी एक संस्कृति, एक लोक जीवन ने एक लोकभासा विया करती थी। धीरे धीरे राजा खतम विया, रियासतां खतम वई, ठिकाणा खतम विया पण लोक जीवतो रियो ने वणा की संस्कृति ने लोक भासा जीवती रई। जईतर जईतर वखत गुजरतो जई रो थो न्हरा सारा साणां लोगां ए होचि के जमीनां तो भेळी करी लिदि पण अबे और चीजां कईतर भेळी करां। तो जतरी जमीन भेळी करी थी वणी जमीन की सीमा वणई ने और चीजां ने बी भेळी करवा लाग्या। ने सब चीजां भेळी करी ने वणी ने एक वड़ो नाम देवा की होचवा लाग्या। पण एक लोक संस्कृति, लोक जीवन ने लोक भासा ने जमीनां के माप मे भेळो करणो कोई हेज वात कोनी थी। पण अणी पे काम तो चाल्यो। ने अणी काम को नतीजो यो रियो के लोकसंस्कृत्यां भेळी वई ने बस रीति रिवाज रई ई, लोक जीवन भेळो वई ने जन जीवन रई यो ने लोकभासां भेळी वई ने बोल्यां रई ई। फेरी अणा साणां लोगां ए होच्यो के ई बोल्यां ज्यां ती आई है, वणी भासा ने होदां। तो ई संस्कृत ती चल्या तो पाली तक आया ने पाली ती शौरसैनी प्राकृत तक आया ने चालता चालता गुर्जरी अपभ्रंस पे जाई ने रुकीया ने वां ती काढ़ी एक भासा जणी ने नाम दिदो ‘राजस्थानी’। -भूमिका ती