सोहणी रात अर धूजता हाथ

2025-12-18 • 2022

सोहणी रात अर धूजता हाथ

प्रकृति कै बारां मं म्हां सुरु सूं ई सुणता अर जाणता आया छां कै या आपणो विकास को क्रम खुद ई तय करै छै अर ई काम मं या चोखी माहिर छै। सिरजण कोई एक दो दन मं होबा वाळी प्रक्रिया कोनै ई को क्रम तो केई करोड़ां बरसां सूं चालर्यो छै अर केई करोड़ां बरसां ताई चालैगो। सालां प्हैली ज्हां बड़ा बड़ा महासागर छा, आज व्हां वीराण रेगिस्तान छै, पहाड्यां छै अर ज्हां साल भर बरफ जमी रहै छी व्हां देवदार, पलास का जंगळ ऊभा छै। प्रकृति आपणो काम करती जारी छै। बगर लाग लपेट, कोयां सूं मतलब रखाण्यां बना, हर पल बदळाव कर री छै। गीता मं बी तो लिख्यो छै कै ‘परिवर्तन प्रकृति को शाश्वत नेम छै।‘ पण उ बदळाव प्रकृति की आपणी एक प्रक्रिया छै कोई जोर जबरदस्ती कोनै। संदी सृष्टि की बात छोड़’र अगर म्हां म्हाकी धरती की ई बात करां तो वैज्ञानिकां कै गोड़ै ई का विकास को एक लम्बो चोड़ो इतिहास छै। कतना ई कल्प बीतग्या पण विकास को यो क्रम जारी ई छै। रूखड़ां सूं लेर जीव जनावरां, नद्यां-नाळा, पर्बत-पहाड़, सागर-महासागर सब्यां कै बणबा बगड़बा को पूरो दारोमदार प्रकृति पै छै। पण काई प्रकृति ई उ की असली रूप का बगाड़ मं एकली जिम्मेदार छै। काई सिरजण को एक मतलब बगाड़ बी छै ? केई बुद्धिजीवी क्है छै ‘प्रकृति आपणा सुभाव अर परिवेस कै अनुरूप खुद नै उ मं ढाळ लै छै।‘ पण उ सुभाव अर परिवेस बी तो प्रकृति को ई बणायो होवैगो ? तो फेर उ नै बगाड़ कस्या क्हैवा, उ तो सिरजण को ई एक रूप होणी चावै छै नं ? छिपकल्यां का पग घस’र साँप बणबो, जिराफ की नाड़की लम्बी होबो और बी केई उदाहरण प्रकृति कै बगाड़ का छै कै ? म्हारा हिसाब सूं यो बगाड़ कोनै यो तो एक क्रमिक विकास छै।