भ से भगत

2025-07-09 • 2025

भ से भगत

23 वर्ष की उम्र और गले में फाँसी का फंदा, सामने निर्मम लोग, बचने की कोई उम्मीद नहीं। कैसा खौफ़नाक दृश्य होगा? कल्पना करते ही रूह सिहर उठती है, मन असहज हो उठता है, जी बैठ जाता है। आँखों के सामने एक शख्स फाँसी के तख्ते पर झूलने वाला है, ऐसे दृश्य के अवसाद से बाहर आना कोई साधारण बात नहीं। परंतु जब इस दृश्य का वह पात्र भगत सिंह हो तो हृदय भय से नहीं, ओज से भर जाता है। शरीर का रोम-रोम उस अकल्पनीय रोमांच का अनुभव करने लगता है। आत्मा शरीर से बाहर निकलने को छटपटाने लगती है। पार्थिवता का हर बंधन रेशा-रेशा होता दीखता है। दिव्यता का उमगता सागर चक्षुपटल पर एक सैलाब बनकर उभरता है और सामने खड़े हर पापी को पवित्र कर देता है। मृत्यु अपना सिर ऊँचा किये गौरवान्वित हो उठती है और ज़िंदगी अनंतकाल के लिये उस स्मृति के पाश में बंध जाती है। माँ दुर्गा की त्रिशूल की तरह बलिवेदी पर खड़े मुस्कुराते तीन युवक घनेरै बादलों के बीच चमकती चपला सदृश्य अमोघ कांति बिखेरते हैं।